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हजारीलाल ने कहा कि मेरी क्‍या मजाल कि मैं सुप्रीम कोर्ट की शान में गुस्‍ताखी करूं। मैं सरकारों के बेहूदा चाल-चलन के बारे में बतला रहा हूं क्‍योंकि उसे चलाने वाले दुष्‍कर्मी हैं। जो आधार कार्ड के बहाने गरीबों के खातों में सब्सिडी के नाम पर नकद ताकत जमा कर रहे हैं। मेरे खाते में भी 600 रुपए जमा मिले हैं ताकि मैं सीधे-सीधे अपने परिवार के पांच वोट उनके पक्ष में समर्पित कर दूं और उनकी सरकार की सुरक्षा सुनिश्चित हो

हजारीलाल ने कहा कि मेरी क्‍या मजाल कि मैं सुप्रीम कोर्ट की शान में गुस्‍ताखी करूं। मैं सरकारों के बेहूदा चाल-चलन के बारे में बतला रहा हूं क्‍योंकि उसे चलाने वाले दुष्‍कर्मी हैं। जो आधार कार्ड के बहाने गरीबों के खातों में सब्सिडी के नाम पर नकद ताकत जमा कर रहे हैं। मेरे खाते में भी 600 रुपए जमा मिले हैं ताकि मैं सीधे-सीधे अपने परिवार के पांच वोट उनके पक्ष में समर्पित कर दूं और उनकी सरकार की सुरक्षा सुनिश्चित हो

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/09/5-2012.html  आज स्थिति यह है कि मास्‍टर तो मास्‍टर माता-पिता भी बच्‍चों से डरने को मजबूर हैं और अपने बच्‍चों की मजदूरी कर रहे हैं। न जाने कब उनकी आंखों का तारा अथवा तारारानी उनकी सरेआम बोलती बंद कर दे इसलिए उन्‍होंने भी बोलने की जहमत उठाना बंद कर दिया है। मास्‍टरों पर अंकुश और उनसे पढ़ने वाले बच्‍चे निरंकुश। आजकल के बच्‍चे मानो, सरकार हो गए हैं और मास्‍टर विपक्षी दल, जिन्‍हें हल्‍की सी फूंक से बच्‍चे उड़ाने में सफल हैं।

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/09/5-2012.html आज स्थिति यह है कि मास्‍टर तो मास्‍टर माता-पिता भी बच्‍चों से डरने को मजबूर हैं और अपने बच्‍चों की मजदूरी कर रहे हैं। न जाने कब उनकी आंखों का तारा अथवा तारारानी उनकी सरेआम बोलती बंद कर दे इसलिए उन्‍होंने भी बोलने की जहमत उठाना बंद कर दिया है। मास्‍टरों पर अंकुश और उनसे पढ़ने वाले बच्‍चे निरंकुश। आजकल के बच्‍चे मानो, सरकार हो गए हैं और मास्‍टर विपक्षी दल, जिन्‍हें हल्‍की सी फूंक से बच्‍चे उड़ाने में सफल हैं।

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/11/27-2012.html  ‘वर्दीवाला गुंडा’ फिल्‍म हिट हुई और इसका उपन्‍यास खूब बिका। यह गुंडों की शराफत है वरना वे बे-वर्दी वाला गुंडई कर्म निबाहने में पीछे नहीं रहते हैं, बलात्‍कार इसी को तो कहते हैं।गुंडे का क्‍या है विवस्‍त्र होकर भी कूद सकता है। वर्दी खाकी भी हो सकती है और खाली भी, सेना की भी और खादी की भी। सुर्खियों में आने के लिए एक चिकित्‍सा मंत्री ने अपना ही इलाज कर डाला, इसे कहते हैं ‘अपना इलाज बवाले जान’।मंत्री ने खुद को ‘खादीवाला सफेदपोश…

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/11/27-2012.html ‘वर्दीवाला गुंडा’ फिल्‍म हिट हुई और इसका उपन्‍यास खूब बिका। यह गुंडों की शराफत है वरना वे बे-वर्दी वाला गुंडई कर्म निबाहने में पीछे नहीं रहते हैं, बलात्‍कार इसी को तो कहते हैं।गुंडे का क्‍या है विवस्‍त्र होकर भी कूद सकता है। वर्दी खाकी भी हो सकती है और खाली भी, सेना की भी और खादी की भी। सुर्खियों में आने के लिए एक चिकित्‍सा मंत्री ने अपना ही इलाज कर डाला, इसे कहते हैं ‘अपना इलाज बवाले जान’।मंत्री ने खुद को ‘खादीवाला सफेदपोश…

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2013/01/blog-post.html  दुष्‍कर्मी और मुन्‍नाभाई संवाद : जनवाणी दैनिक प्रथम जनवरी तेरह स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2013/01/blog-post.html दुष्‍कर्मी और मुन्‍नाभाई संवाद : जनवाणी दैनिक प्रथम जनवरी तेरह स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/11/6-2012.html  भ्रष्‍टाचार करना और मिटाना दोनों आजकल बतौर कैरियर खूब पसंद किए जा रहे हैं। भ्रष्‍टाचार को इस समय सबसे अधिक फुटेज मिल रही है। पिछले कई महीने से उसकी ऊंचाई का ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर की ओर गया है लेकिन उससे प्रभावित वे नीचे वाले हो रहे हैं। यह ऐसा धंधा है कि भ्रष्‍टाचार करो तो खूब कमा लो और मुखालफत करो तब भी जेबें लबालब भर लो।  महंगाई इस सच को जान गई है और उसका रो रोकर बहुत बुरा हाल है। वह मन ही मन ....

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/11/6-2012.html भ्रष्‍टाचार करना और मिटाना दोनों आजकल बतौर कैरियर खूब पसंद किए जा रहे हैं। भ्रष्‍टाचार को इस समय सबसे अधिक फुटेज मिल रही है। पिछले कई महीने से उसकी ऊंचाई का ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर की ओर गया है लेकिन उससे प्रभावित वे नीचे वाले हो रहे हैं। यह ऐसा धंधा है कि भ्रष्‍टाचार करो तो खूब कमा लो और मुखालफत करो तब भी जेबें लबालब भर लो। महंगाई इस सच को जान गई है और उसका रो रोकर बहुत बुरा हाल है। वह मन ही मन ....

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/10/9-2012.html  ममता की मकड़ी ऐसी कड़ी है जो ममता नहीं है, हवस या वासना जरूर है। मकड़ी अपनी भूख-प्‍यास को मिटाने के लिए मक्‍खी को जाल में फंसाती है और उस पर बुरी तरह टूट पड़ती है। बडी मकड़ी छोटी मकड़ी के मामले में भी ममता नहीं दिखलाती है,  वैसे ही जैसे बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को खा जाती हैं। मकडि़यों के मामले में भी ऐसा है और ममता के मामले में जानने के लिए आपको अपनी छठी इंद्रिय या तीसरी आंख को सक्रिय करना होगा ?

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/10/9-2012.html ममता की मकड़ी ऐसी कड़ी है जो ममता नहीं है, हवस या वासना जरूर है। मकड़ी अपनी भूख-प्‍यास को मिटाने के लिए मक्‍खी को जाल में फंसाती है और उस पर बुरी तरह टूट पड़ती है। बडी मकड़ी छोटी मकड़ी के मामले में भी ममता नहीं दिखलाती है, वैसे ही जैसे बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को खा जाती हैं। मकडि़यों के मामले में भी ऐसा है और ममता के मामले में जानने के लिए आपको अपनी छठी इंद्रिय या तीसरी आंख को सक्रिय करना होगा ?

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2013/02/5-2013_5.html  देश गिरने का अंदेशा ! : दैनिक जनवाणी 5 फरवरी 2013 के तीखी नजर स्‍तंभ में प्रकाशित  सरकार को बार बार ऐसा भी महसूस हुआ था कि किसी ने देश को किसी खूंटे से बांध रखा है। जबकि खूंटे से बंधने के बाद भी खूंटे से छूटने की कोशिश जानवर भी जरूर करता है। देश का विकास इतनी सारी कोशिशों के बाद सागर न सही, नदी जितना होना चाहिए था।  जबकि वह न तालाब जितना हो रहा था और न कुंए जितना ही, ऐसा लगता था कि कुंए में मेढकों की भी मौत हो गई है।

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2013/02/5-2013_5.html देश गिरने का अंदेशा ! : दैनिक जनवाणी 5 फरवरी 2013 के तीखी नजर स्‍तंभ में प्रकाशित सरकार को बार बार ऐसा भी महसूस हुआ था कि किसी ने देश को किसी खूंटे से बांध रखा है। जबकि खूंटे से बंधने के बाद भी खूंटे से छूटने की कोशिश जानवर भी जरूर करता है। देश का विकास इतनी सारी कोशिशों के बाद सागर न सही, नदी जितना होना चाहिए था। जबकि वह न तालाब जितना हो रहा था और न कुंए जितना ही, ऐसा लगता था कि कुंए में मेढकों की भी मौत हो गई है।

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/12/25-2012_25.html  वोट दो और मर जाओ : जनवाणी 25 दिसम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित  आज का दिन बेहद बड़ा दिन। दिसम्‍बर माह की 25 तारीख। बड़े दिन में खुशियां होनी चाहिएं अनगिन। जबकि नहीं होतीं गिनने लायक भी। उंगलियों पर गिनने लायक भी हों तो तसल्‍ली हो जाए। दुख की वाट लग जाए। पर ऐसा होता नहीं है जबकि हर एक वोटर जरूरी होता है।  दिनों में भी भेद ही भेद, कोई भाव नहीं। दिन के आकार में भी हम नहीं ला पाए आज तक समाजवाद। दिन बड़ा है तो इस…

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/12/25-2012_25.html वोट दो और मर जाओ : जनवाणी 25 दिसम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित आज का दिन बेहद बड़ा दिन। दिसम्‍बर माह की 25 तारीख। बड़े दिन में खुशियां होनी चाहिएं अनगिन। जबकि नहीं होतीं गिनने लायक भी। उंगलियों पर गिनने लायक भी हों तो तसल्‍ली हो जाए। दुख की वाट लग जाए। पर ऐसा होता नहीं है जबकि हर एक वोटर जरूरी होता है। दिनों में भी भेद ही भेद, कोई भाव नहीं। दिन के आकार में भी हम नहीं ला पाए आज तक समाजवाद। दिन बड़ा है तो इस…

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/12/11-2012_11.html   एफडीआई की सटीक व्‍याख्‍या ‘फुल ड्रामा इन इंडिया’ की जा सकती है परंतु इसे ‘फॉरेन डायरेक्‍ट इंवेस्‍टमेंट’ कहकर सदा से सबको लुभाया जाता रहा है। जबकि इस असलियत की कलई कुछ लोग‘फेल्‍ड डेमोक्रेसी इन इंडिया’ का नाम देकर खोलते हैं और ‘फटाफट डकारो इंडिया’ कहकर इनकी नीयत पर ही सवाल उठा देते हैं। सोशल मीडिया पर इनकी फजीहत जारी है किंतु संसद में सांसद इनकी नित नई गोलाईयां उभारने में बिजी हैं। चक्‍करघिन्‍नी की तरह घूमते देश के सिर पर…

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/12/11-2012_11.html एफडीआई की सटीक व्‍याख्‍या ‘फुल ड्रामा इन इंडिया’ की जा सकती है परंतु इसे ‘फॉरेन डायरेक्‍ट इंवेस्‍टमेंट’ कहकर सदा से सबको लुभाया जाता रहा है। जबकि इस असलियत की कलई कुछ लोग‘फेल्‍ड डेमोक्रेसी इन इंडिया’ का नाम देकर खोलते हैं और ‘फटाफट डकारो इंडिया’ कहकर इनकी नीयत पर ही सवाल उठा देते हैं। सोशल मीडिया पर इनकी फजीहत जारी है किंतु संसद में सांसद इनकी नित नई गोलाईयां उभारने में बिजी हैं। चक्‍करघिन्‍नी की तरह घूमते देश के सिर पर…

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/10/2-2012_2.html    गांधी जी की पत्रकारिता सामाजिक सरोकारों की रही

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/10/2-2012_2.html गांधी जी की पत्रकारिता सामाजिक सरोकारों की रही

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