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हजारीलाल ने कहा कि मेरी क्‍या मजाल कि मैं सुप्रीम कोर्ट की शान में गुस्‍ताखी करूं। मैं सरकारों के बेहूदा चाल-चलन के बारे में बतला रहा हूं क्‍योंकि उसे चलाने वाले दुष्‍कर्मी हैं। जो आधार कार्ड के बहाने गरीबों के खातों में सब्सिडी के नाम पर नकद ताकत जमा कर रहे हैं। मेरे खाते में भी 600 रुपए जमा मिले हैं ताकि मैं सीधे-सीधे अपने परिवार के पांच वोट उनके पक्ष में समर्पित कर दूं और उनकी सरकार की सुरक्षा सुनिश्चित हो

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2013/01/blog-post.html दुष्‍कर्मी और मुन्‍नाभाई संवाद : जनवाणी दैनिक प्रथम जनवरी तेरह स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/12/18-2012.html नब्‍बे फीसदी भारतीय बेवकूफ हैं, न्‍यायमूर्ति काटजू के इस कथन का सकारात्‍मक पक्ष भीहै कि बेवकूफ बहुमत में हैं। लोकतंत्र ही बहुमत, बहुमत ही लोकतंत्र है, इसके मुकाबले न ठहरा कोई तंत्र है। मतलब लोकतंत्र में बहुमत की तूती बोलती है और पुंगी बजती है। सोचिए भला, सिर्फ दस प्रतिशत बु‍द्धिमान क्‍या घास छील लेंगे, कोशिश करेंगे भी तो थक जाएंगे। उनने माहिर चिकित्‍सक की भांति कहा है कि इनके दिमाग में भेजा नहीं होता। इससे यह भी लगता है कि

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/12/4-2012.html चारों की चौकड़ी आज स्‍पेशल सुविधाओं के तहत स्‍वर्ग में धूम मचा रही है। जबकि उन्‍होंने जिन कारनामों को अंजाम दिया था, उसके अनुसार उनकी नर्क में सजा पाने की ग्राह्यता बनती थी। ठाकरे भगवान के सैनिकों का गठन करके उनकी दबंगई के बल पर वहां मौजूद थे। कसाब को यमराज के कार्यों में हस्‍तक्षेप के चलते तुरंत बुलाया गया था, मच्‍छर ने यमराज के काम को आसान किया था विशेष भत्‍तों में इकानॉमी लाने के कारण और दारू किंग पोंटी चड्ढा को अपरोक्ष तौर…

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/12/25-2012_25.html वोट दो और मर जाओ : जनवाणी 25 दिसम्‍बर 2012 स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित आज का दिन बेहद बड़ा दिन। दिसम्‍बर माह की 25 तारीख। बड़े दिन में खुशियां होनी चाहिएं अनगिन। जबकि नहीं होतीं गिनने लायक भी। उंगलियों पर गिनने लायक भी हों तो तसल्‍ली हो जाए। दुख की वाट लग जाए। पर ऐसा होता नहीं है जबकि हर एक वोटर जरूरी होता है। दिनों में भी भेद ही भेद, कोई भाव नहीं। दिन के आकार में भी हम नहीं ला पाए आज तक समाजवाद। दिन बड़ा है तो इस…

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/11/6-2012.html भ्रष्‍टाचार करना और मिटाना दोनों आजकल बतौर कैरियर खूब पसंद किए जा रहे हैं। भ्रष्‍टाचार को इस समय सबसे अधिक फुटेज मिल रही है। पिछले कई महीने से उसकी ऊंचाई का ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर की ओर गया है लेकिन उससे प्रभावित वे नीचे वाले हो रहे हैं। यह ऐसा धंधा है कि भ्रष्‍टाचार करो तो खूब कमा लो और मुखालफत करो तब भी जेबें लबालब भर लो। महंगाई इस सच को जान गई है और उसका रो रोकर बहुत बुरा हाल है। वह मन ही मन ....

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/11/27-2012.html ‘वर्दीवाला गुंडा’ फिल्‍म हिट हुई और इसका उपन्‍यास खूब बिका। यह गुंडों की शराफत है वरना वे बे-वर्दी वाला गुंडई कर्म निबाहने में पीछे नहीं रहते हैं, बलात्‍कार इसी को तो कहते हैं।गुंडे का क्‍या है विवस्‍त्र होकर भी कूद सकता है। वर्दी खाकी भी हो सकती है और खाली भी, सेना की भी और खादी की भी। सुर्खियों में आने के लिए एक चिकित्‍सा मंत्री ने अपना ही इलाज कर डाला, इसे कहते हैं ‘अपना इलाज बवाले जान’।मंत्री ने खुद को ‘खादीवाला सफेदपोश…

उनका दिल मदिरा का दरिया : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नजर' 8 अगस्‍त 2013 को प्रकाशित http://avinash.nukkadh.com/2013/08/8-2013.html

http://avinashvachaspatinetwork.blogspot.in/2012/10/9-2012.html ममता की मकड़ी ऐसी कड़ी है जो ममता नहीं है, हवस या वासना जरूर है। मकड़ी अपनी भूख-प्‍यास को मिटाने के लिए मक्‍खी को जाल में फंसाती है और उस पर बुरी तरह टूट पड़ती है। बडी मकड़ी छोटी मकड़ी के मामले में भी ममता नहीं दिखलाती है, वैसे ही जैसे बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को खा जाती हैं। मकडि़यों के मामले में भी ऐसा है और ममता के मामले में जानने के लिए आपको अपनी छठी इंद्रिय या तीसरी आंख को सक्रिय करना होगा ?

http://www.nukkadh.com/2013/02/26-2013.html पीएम पद की मिठाई खाने की लालसा : दैनिक जनवाणी 26 फरवरी 2013 स्‍तंभ 'तीखी नज़र' में प्रकाशित पीएम का पद पकवान सरीखा है जबकि यह वह जलेबी नहीं है जो सीधी हो। सीधी जलेबियां राजनीति में तो मिलती नहीं हैं। सब खीर खाना चाहते हैं, एक साथ टूट भी पड़ते हैं पर जिस बरतन पर वे एक साथ भूखों की तरह लारातुर हैं, वह रसमलाई है। खीर पर एक चौकस बिल्‍ली की नजर है, वह उसे अपने जवान होते बच्‍चे को खिलाएगी। उसने सारे जोड़-तोड़ और जुगाड़ बिठा लिए हैं।